सरकार और उद्योग जगत के कई हिस्सों से एक साथ नकारे जाने के बाद प्रमुख उद्योग चैंबर ASSOCHAM ने अपनी उस विवादास्पद रिपोर्ट को वापस ले लिया है, जिसमें 10 दिनों के भीतर 25 फीसदी नौकरियों में छंटनी की बात कही गई थी। एसोचैम ने अपनी रिपोर्ट वापस लेते हुए यह भी कहा है कि कुछ क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं। एसोचैम की रिपोर्ट पर जबरदस्त राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई थी।
दो दिन पहले एसोचैम की तरफ से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया था कि सीमेंट, स्टील, आईटी, बीपीओ सहित सात प्रमुख क्षेत्रों में अगले 10 दिनों के भीतर 25 फीसदी कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।
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04 November, 2008
30 October, 2008
अगले दस दिन में आपकी नौकरी जा सकती है!
देश के प्रमुख वाणिज्य उघोग मंडल ASSOCHAM ने एक आकलन किया है कि सीमेंट, इस्पात, निर्माण, अचल संपत्ति, उड्डयन, सूचना आधारित और वित्त सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों को सतर्क होना चाहिए क्योंकि आने वाले चंद दिनों में इन क्षेत्रों में बडे़ पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी किए जाने की संभावना है। एसोचैम ने अनुमान व्यक्त किया है कि संभवत: इस क्षेत्र में 25 से 30 प्रतिशत कर्मचारी हटाए जाएंगे।संगठन का कहना है कि आर्थिक वित्त संकट के दौर में सिकुड़ते मार्जिन को देखते हुए इन क्षेत्रों की कंपनियां लागत को कम करने के उपायों के तहत अगले दस दिन में नौकरियों पर कैंची चला सकती है। एसोचैम ने कहा है कि पिछले दो तिमाही से विस्तार की गति थमी है। देश के सकल घरेलू उत्पाद की बृद्धि दर पिछले चार साल में आठ प्रतिशत से नीचे आने की संभावना है। वित्त संकट को देखते हुए ऊंची ब्याज दरों के कारण मांग प्रभावित हुई है।
रिजर्व बैंक ने 24 अक्टूबर को जारी चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही की मौद्रिक एवं ऋण नीति की समीझा में देश की विकास दर के अनुमान को पहले के आठ प्रतिशत की तुलना में 2008-09 में घटाकर 7.5 से 8 प्रतिशत कर दिया है। समाप्त वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद में नौ प्रतिशत की जोरदार वृद्धि हुई थी।
एसोचैम ने कहा है नियोक्ता के पास अपनी कंपनी रणनीति के तहत परिचालन को बनाए रखने के लिए इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है। घटते मार्जिन में कंपनियां पहले ही लागत कम करने के लिए पहले ही कई कदम उठा चुकी है। टाटा स्टील हाल ही में अनुबंध में रखे गए अपने सैकड़ों कर्मचारियों को हटा चुका है। इससे पहले निजी क्षेत्र की विमानन कंपनी जेट एअरवेज ने 1900 कर्मचारियों को हटाने के फैसले से काफी बवाल मचा था और इसके बाद कंपनी को अपना यह फैसला वापस लेना पड़ा था। पिछले सप्ताह रियल एस्टेट क्षेत्र की कंपनी पार्श्वनाथ ने भी पिछले सप्ताह कहा है कि वह अपने कर्मचारियों की संख्या को तर्क संगत बनाएगी।
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21 February, 2008
विकास दर के बिना नौकरी कहाँ ?
आर्थिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने श्रम सुधार को सेकंडरी करार दिया है। उनका कहना है कि अगर पढ़े-लिखे नौजवानों को नौकरी देनी है तो इकॉनमी ग्रोथ रेट बढ़ाना ही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। रोजगार बढ़ाने के लिए श्रम कानूनों में बदलाव करने की जरूरत नहीं है। अगर इकॉनमी ग्रोथ रेट 9 से 10 फीसदी के बीच कायम रखने में भारत कामयाब रहा तो श्रम कानूनों में बदलाव किए बिना ही रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
आम बजट से ठीक पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष के इस बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसे एक संकेत भी माना जा रहा है कि सरकार इस बजट में उद्योग जगत की श्रम कानूनों में बदलाव करने की मांग को तवज्जो नहीं देगी। मोंटेक सिंह के इस बयान को इस मसले पर सरकार का ताजा नजरिया माना जा रहा है।
मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा कि बेशक यह बात सही है कि श्रम कानूनों को लचीला बनाने से रोजगार के अवसरों को बढ़ाया जा सकता है। मगर यह तभी संभव है जब इकॉनमी ग्रोथ रेट ज्यादा रहे। इसके अलावा श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर कई तकनीकी पहलू ऐसे हैं, जिनपर सहमति बनाना जरूरी है। बिना सभी की सहमति के श्रम कानूनों में बदलाव करना तर्कसंगत नहीं रहेगा। इकॉनमी ग्रोथ रेट सीधे तौर पर प्रॉडक्शन से जुड़ा हुआ है। अगर हम श्रमिकों की प्रॉडक्शन क्षमता बढ़ाने में सफल रहे तो उससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी बल्कि बाजार में रौनक भी बढ़ेगी। यह रौनक आम लोगों की जेब भी भरेगी और उन्हें ज्यादा काम भी देगी। चीन में श्रमिकों की उत्पादक क्षमता बढ़ने का अहम कारण यही है। चीन में प्रति व्यक्ति उत्पादक क्षमता भारत के प्रति व्यक्ति से तीन से चार गुना ज्यादा है। यही कारण है कि चीन, बाजार और मजबूत इकॉनमी के मामले में भारत से काफी आगे है।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि यह बात काफी चुभती है कि देश में पढ़े-लिखे नौजवानों के पास नौकरी नहीं है। नौजवानों को उच्च शिक्षा देने के साथ-साथ ढांचागत सुविधाओं के विकास और वर्तमान श्रमिकों को हल्की-फुल्की उपयोगी ट्रेनिंग दे कर उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाना चाहिए। वर्तमान में बेरोजगारी दर 8 फीसदी है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल आबादी के परिप्रेक्ष्य में 28 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे साफ जाहिर है कि लोगों की वास्तविक मजदूरी बढ़ नहीं रही है। रोजगार न मिलने से युवकों में निराशा फैलती जा रही है। गरीब और अमीर के जीवन स्तर में बढ़े फर्क से सामाजिक तनाव पैदा होता है।
उद्योग जगत की अहम मांग है कि श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाएं। उद्योग जगत इसमें लचीलापन चाहता है ताकि कर्मचारियों से उनकी योग्यता के अनुसार काम लेने में उन्हें परेशानी न हो। उनकी मांग यह भी है कि कारोबार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उन्हें कर्मचारियों की छंटनी का अधिकार भी दिया जाए।
आम बजट से ठीक पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष के इस बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसे एक संकेत भी माना जा रहा है कि सरकार इस बजट में उद्योग जगत की श्रम कानूनों में बदलाव करने की मांग को तवज्जो नहीं देगी। मोंटेक सिंह के इस बयान को इस मसले पर सरकार का ताजा नजरिया माना जा रहा है।
मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा कि बेशक यह बात सही है कि श्रम कानूनों को लचीला बनाने से रोजगार के अवसरों को बढ़ाया जा सकता है। मगर यह तभी संभव है जब इकॉनमी ग्रोथ रेट ज्यादा रहे। इसके अलावा श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर कई तकनीकी पहलू ऐसे हैं, जिनपर सहमति बनाना जरूरी है। बिना सभी की सहमति के श्रम कानूनों में बदलाव करना तर्कसंगत नहीं रहेगा। इकॉनमी ग्रोथ रेट सीधे तौर पर प्रॉडक्शन से जुड़ा हुआ है। अगर हम श्रमिकों की प्रॉडक्शन क्षमता बढ़ाने में सफल रहे तो उससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी बल्कि बाजार में रौनक भी बढ़ेगी। यह रौनक आम लोगों की जेब भी भरेगी और उन्हें ज्यादा काम भी देगी। चीन में श्रमिकों की उत्पादक क्षमता बढ़ने का अहम कारण यही है। चीन में प्रति व्यक्ति उत्पादक क्षमता भारत के प्रति व्यक्ति से तीन से चार गुना ज्यादा है। यही कारण है कि चीन, बाजार और मजबूत इकॉनमी के मामले में भारत से काफी आगे है।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि यह बात काफी चुभती है कि देश में पढ़े-लिखे नौजवानों के पास नौकरी नहीं है। नौजवानों को उच्च शिक्षा देने के साथ-साथ ढांचागत सुविधाओं के विकास और वर्तमान श्रमिकों को हल्की-फुल्की उपयोगी ट्रेनिंग दे कर उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाना चाहिए। वर्तमान में बेरोजगारी दर 8 फीसदी है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल आबादी के परिप्रेक्ष्य में 28 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे साफ जाहिर है कि लोगों की वास्तविक मजदूरी बढ़ नहीं रही है। रोजगार न मिलने से युवकों में निराशा फैलती जा रही है। गरीब और अमीर के जीवन स्तर में बढ़े फर्क से सामाजिक तनाव पैदा होता है।
उद्योग जगत की अहम मांग है कि श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाएं। उद्योग जगत इसमें लचीलापन चाहता है ताकि कर्मचारियों से उनकी योग्यता के अनुसार काम लेने में उन्हें परेशानी न हो। उनकी मांग यह भी है कि कारोबार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उन्हें कर्मचारियों की छंटनी का अधिकार भी दिया जाए।
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