अगली बार जब आप साक्षात्कार के लिए जाएं तो यह सुनिश्चित कर लें कि आपने अच्छी टाई पहनी हो। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि नई नौकरी पाने में टाई के रंग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि टाई का रंग और उसकी डिजाइन कुछ खास तरह के लोगों से संबंधित होती है। उदाहरण के लिए बैगनी, हरी या गुलाबी रंग की टाई पहनना नई नौकरी के लिए अच्छा नहीं है।
उनके अनुसार बैगनी रंग की टाई घमंड एवं तड़क-भड़क का सूचक है और साक्षात्कार से पहले ही उम्मीदवार को खारिज किया जा सकता है। हरे रंग की टाई का भी बुरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे पता चलता है कि पहनने वाला आदमी लालची, ईर्ष्यालु एवं दुर्भाग्यशाली है। और गुलाबी रंग की टाई को वार्डरोब में सबसे पीछे रखना चाहिए, क्योंकि भावुक प्रेमी इसे ज्यादा पसंद करते हैं। तब शुभ टाई कौन सी रहेगी।
शोध के अनुसार पीली, लाल और कत्थई रंग बेहतर होगा। इन रंगों की टाइयां पहनने वालों को क्रमश: दमदार, शाक्तिशाली और सौम्य प्रवृत्ति वाला माना जाता है।
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08 November, 2008
01 November, 2008
अविवाहित सरकारीकर्मी के आश्रित को अनुकंपा पर नौकरी
बिहार में अब अविवाहित सरकारी कर्मियों की सेवा काल में मौत होने पर उनके आश्रितों को भी अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल सकेगी। अब तक ऐसा प्रावधान नहीं था। 30 अक्टूबर को कैबिनेट की बैठक में इस आशय का फैसला लिया गया। इसके अतिरिक्त सरकारी कर्मियों की गुमशुदगी की स्थिति में अब सात वर्ष की जगह दो वर्ष की अवधि में ही उनके एक आश्रित को नौकरी मिल सकेगी। कैबिनेट की बैठक में हुए निर्णयों की जानकारी कैबिनेट के प्रधान सचिव गिरीश शंकर ने मीडिया को दी।
उन्होंने बताया कि सेवाकाल में अविवाहित कर्मियों की मौत होने पर समूह-ग व घ के पदों पर उनके भाई, विधवा, मां या छोटी बहन को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल सकेगी। इसी तरह अगर कोई सरकारी कर्मी गुम हो जाता है तो अब दो वर्ष के भीतर उसके परिजन को उसकी जगह नौकरी मिल जाएगी। पहले इसके लिए सात वर्षों तक इंतजार किया जाता था। दो वर्ष बाद संबंधित कर्मी की जगह नौकरी कर रहे उसके आश्रित की नौकरी उस वक्त स्वत: समाप्त हो जाएगी जब गुम सरकारी कर्मी अचानक लौट आए।
उन्होंने बताया कि सेवाकाल में अविवाहित कर्मियों की मौत होने पर समूह-ग व घ के पदों पर उनके भाई, विधवा, मां या छोटी बहन को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल सकेगी। इसी तरह अगर कोई सरकारी कर्मी गुम हो जाता है तो अब दो वर्ष के भीतर उसके परिजन को उसकी जगह नौकरी मिल जाएगी। पहले इसके लिए सात वर्षों तक इंतजार किया जाता था। दो वर्ष बाद संबंधित कर्मी की जगह नौकरी कर रहे उसके आश्रित की नौकरी उस वक्त स्वत: समाप्त हो जाएगी जब गुम सरकारी कर्मी अचानक लौट आए।
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26 June, 2008
नौकरी के दौरान तनाव,पुरुषों की तुलना में महिलायों को अधिक
कामकाजी पुरुषों व महिलाओं के बीच किए गए अध्ययन में पाया गया कि अवसाद के छह में से एक मामले का कारण नौकरी है। अध्ययन से पता चला है कि नौकरी के दौरान तनाव का सामना पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक करना पड़ता है। इसका कारण तुलनात्मक रूप से काम में उनका कम दक्ष होना है।
विक्टोरिया में काम करने वाले १,१०० कर्मचारियों पर २००३ में अध्ययन किया गया था जिससे यह आंकड़ा मिला था। नौकरी की बढ़ती मांग को देखते हुए कार्यालयों का माहौल तनावयुक्त होता जा रहा है। कामकाजी लोगों में कार्यस्थल पर तनाव के कारण अवसाद की सम्भावना बढ़ती जा रही है।
कार्यालय की ओर से तनाव के कारण मानसिक परेशानियों की गिरफ्त में आने वाले कर्मचारियों की मदद भी नहीं की जाती। यही कारण है कि ऐसे मामलों से जुड़ी जानकारी भी कम ही मिल पाती है। शोधकर्ता मेलबर्न विश्वविद्यालय के टोनी लामोन्टेग्न ने कहा, ॰कम दक्ष महिलाओं में काम का तनाव तुलनात्मक रूप से ज्यादा होता है।” वह कहते हैं, ॰स्पष्ट है कि लोग स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से ग्रस्त हैं और मानसिक बीमारी का एक महत्वपूर्ण कारण नौकरी है।” उनहोंने कहा, ॰हमें आशा है कि कार्यालय यदि अपने कर्मचारियों के साथ सहयोग करेंगे तो इस समस्या का बड़े पैमाने पर हल हो पाएगा। साथ ही कम दक्ष कर्मचारियों, खासकर महिला कर्मचारियों को इससे काफी मदद मिलेगी। इस अध्ययन से जुड़ी बातें पब्लिक हेल्थज् पत्रिका के नए अंक में विस्तार से दी गई है।
विक्टोरिया में काम करने वाले १,१०० कर्मचारियों पर २००३ में अध्ययन किया गया था जिससे यह आंकड़ा मिला था। नौकरी की बढ़ती मांग को देखते हुए कार्यालयों का माहौल तनावयुक्त होता जा रहा है। कामकाजी लोगों में कार्यस्थल पर तनाव के कारण अवसाद की सम्भावना बढ़ती जा रही है।
कार्यालय की ओर से तनाव के कारण मानसिक परेशानियों की गिरफ्त में आने वाले कर्मचारियों की मदद भी नहीं की जाती। यही कारण है कि ऐसे मामलों से जुड़ी जानकारी भी कम ही मिल पाती है। शोधकर्ता मेलबर्न विश्वविद्यालय के टोनी लामोन्टेग्न ने कहा, ॰कम दक्ष महिलाओं में काम का तनाव तुलनात्मक रूप से ज्यादा होता है।” वह कहते हैं, ॰स्पष्ट है कि लोग स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से ग्रस्त हैं और मानसिक बीमारी का एक महत्वपूर्ण कारण नौकरी है।” उनहोंने कहा, ॰हमें आशा है कि कार्यालय यदि अपने कर्मचारियों के साथ सहयोग करेंगे तो इस समस्या का बड़े पैमाने पर हल हो पाएगा। साथ ही कम दक्ष कर्मचारियों, खासकर महिला कर्मचारियों को इससे काफी मदद मिलेगी। इस अध्ययन से जुड़ी बातें पब्लिक हेल्थज् पत्रिका के नए अंक में विस्तार से दी गई है।
29 March, 2008
सरकारी नौकरी छोड़ने के फायदे
छठे वेतन आयोग की एक और सिफारिश सरकार के लिए मुसीबत बन सकती है। सेवा निवृत्ति से पहले नौकरी छोड़ना केंद्रीय कर्मचारियों के लिए फायदेमंद हो सकता है लेकिन, इससे सरकारी कम्पनियों में काम करने वाले कर्मचारी मुश्किल से ही बचेंगे। छठे वेतन आयोग का सुझाव है कि 15 साल से ज्यादा लेकिन 20 साल से कम की सेवा के बाद खुद सेवानिवृत्ति लेने वाले कर्मचारियों को आखिरी वेतन का 80 गुना सेवानिवृत्ति लाभ के तौर पर दिया जाए। साथ ही उन्हें ‘सेवा आनुतोषिक’ (सर्विस ग्रैच्युटी) और ‘मृत्यु और सेवानिवृत्ति आनुतोषिक’ (डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रैच्युटी) जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी।इसके साथ ही 20 साल की सेवा पूरी करके नौकरी छोड़ने वालों को आखिरी तनख्वाह का 50 फीसदी पेंशन मिलेगा। पहले इसके लिए 33 साल नौकरी करने की शर्त थी। जानकारों का मानना है कि इन सुविधाओं के चलते मध्यस्तरीय सरकारी कर्मचारी नौकरियां छोड़ेंगे। कुछ जानकार ऐसे भी हैं जिनकी राय में अब प्रतिभाशाली सरकारी कर्मचारी निजी नौकरियों की तरफ भागेंगे।
इस बात की काफी संभावना है कि वीआरएस और पेंशन से जुड़े वेतन आयोग के सुझाव मान लिए जाएंगे क्योंकि इससे कर्मचारी भी खुश होंगे और सरकारी क्षेत्र से लोगों को कम करने का सरकार का मकसद भी पूरा होगा। वैसे भी वेतन आयोग ने सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 62 साल करने की मांग खारिज कर दी है।
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21 February, 2008
विकास दर के बिना नौकरी कहाँ ?
आर्थिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने श्रम सुधार को सेकंडरी करार दिया है। उनका कहना है कि अगर पढ़े-लिखे नौजवानों को नौकरी देनी है तो इकॉनमी ग्रोथ रेट बढ़ाना ही सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। रोजगार बढ़ाने के लिए श्रम कानूनों में बदलाव करने की जरूरत नहीं है। अगर इकॉनमी ग्रोथ रेट 9 से 10 फीसदी के बीच कायम रखने में भारत कामयाब रहा तो श्रम कानूनों में बदलाव किए बिना ही रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
आम बजट से ठीक पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष के इस बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसे एक संकेत भी माना जा रहा है कि सरकार इस बजट में उद्योग जगत की श्रम कानूनों में बदलाव करने की मांग को तवज्जो नहीं देगी। मोंटेक सिंह के इस बयान को इस मसले पर सरकार का ताजा नजरिया माना जा रहा है।
मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा कि बेशक यह बात सही है कि श्रम कानूनों को लचीला बनाने से रोजगार के अवसरों को बढ़ाया जा सकता है। मगर यह तभी संभव है जब इकॉनमी ग्रोथ रेट ज्यादा रहे। इसके अलावा श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर कई तकनीकी पहलू ऐसे हैं, जिनपर सहमति बनाना जरूरी है। बिना सभी की सहमति के श्रम कानूनों में बदलाव करना तर्कसंगत नहीं रहेगा। इकॉनमी ग्रोथ रेट सीधे तौर पर प्रॉडक्शन से जुड़ा हुआ है। अगर हम श्रमिकों की प्रॉडक्शन क्षमता बढ़ाने में सफल रहे तो उससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी बल्कि बाजार में रौनक भी बढ़ेगी। यह रौनक आम लोगों की जेब भी भरेगी और उन्हें ज्यादा काम भी देगी। चीन में श्रमिकों की उत्पादक क्षमता बढ़ने का अहम कारण यही है। चीन में प्रति व्यक्ति उत्पादक क्षमता भारत के प्रति व्यक्ति से तीन से चार गुना ज्यादा है। यही कारण है कि चीन, बाजार और मजबूत इकॉनमी के मामले में भारत से काफी आगे है।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि यह बात काफी चुभती है कि देश में पढ़े-लिखे नौजवानों के पास नौकरी नहीं है। नौजवानों को उच्च शिक्षा देने के साथ-साथ ढांचागत सुविधाओं के विकास और वर्तमान श्रमिकों को हल्की-फुल्की उपयोगी ट्रेनिंग दे कर उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाना चाहिए। वर्तमान में बेरोजगारी दर 8 फीसदी है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल आबादी के परिप्रेक्ष्य में 28 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे साफ जाहिर है कि लोगों की वास्तविक मजदूरी बढ़ नहीं रही है। रोजगार न मिलने से युवकों में निराशा फैलती जा रही है। गरीब और अमीर के जीवन स्तर में बढ़े फर्क से सामाजिक तनाव पैदा होता है।
उद्योग जगत की अहम मांग है कि श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाएं। उद्योग जगत इसमें लचीलापन चाहता है ताकि कर्मचारियों से उनकी योग्यता के अनुसार काम लेने में उन्हें परेशानी न हो। उनकी मांग यह भी है कि कारोबार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उन्हें कर्मचारियों की छंटनी का अधिकार भी दिया जाए।
आम बजट से ठीक पहले योजना आयोग के उपाध्यक्ष के इस बयान को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। इसे एक संकेत भी माना जा रहा है कि सरकार इस बजट में उद्योग जगत की श्रम कानूनों में बदलाव करने की मांग को तवज्जो नहीं देगी। मोंटेक सिंह के इस बयान को इस मसले पर सरकार का ताजा नजरिया माना जा रहा है।
मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने कहा कि बेशक यह बात सही है कि श्रम कानूनों को लचीला बनाने से रोजगार के अवसरों को बढ़ाया जा सकता है। मगर यह तभी संभव है जब इकॉनमी ग्रोथ रेट ज्यादा रहे। इसके अलावा श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर कई तकनीकी पहलू ऐसे हैं, जिनपर सहमति बनाना जरूरी है। बिना सभी की सहमति के श्रम कानूनों में बदलाव करना तर्कसंगत नहीं रहेगा। इकॉनमी ग्रोथ रेट सीधे तौर पर प्रॉडक्शन से जुड़ा हुआ है। अगर हम श्रमिकों की प्रॉडक्शन क्षमता बढ़ाने में सफल रहे तो उससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी बल्कि बाजार में रौनक भी बढ़ेगी। यह रौनक आम लोगों की जेब भी भरेगी और उन्हें ज्यादा काम भी देगी। चीन में श्रमिकों की उत्पादक क्षमता बढ़ने का अहम कारण यही है। चीन में प्रति व्यक्ति उत्पादक क्षमता भारत के प्रति व्यक्ति से तीन से चार गुना ज्यादा है। यही कारण है कि चीन, बाजार और मजबूत इकॉनमी के मामले में भारत से काफी आगे है।
योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि यह बात काफी चुभती है कि देश में पढ़े-लिखे नौजवानों के पास नौकरी नहीं है। नौजवानों को उच्च शिक्षा देने के साथ-साथ ढांचागत सुविधाओं के विकास और वर्तमान श्रमिकों को हल्की-फुल्की उपयोगी ट्रेनिंग दे कर उनकी रोजगार क्षमता को बढ़ाना चाहिए। वर्तमान में बेरोजगारी दर 8 फीसदी है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या कुल आबादी के परिप्रेक्ष्य में 28 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे साफ जाहिर है कि लोगों की वास्तविक मजदूरी बढ़ नहीं रही है। रोजगार न मिलने से युवकों में निराशा फैलती जा रही है। गरीब और अमीर के जीवन स्तर में बढ़े फर्क से सामाजिक तनाव पैदा होता है।
उद्योग जगत की अहम मांग है कि श्रम कानूनों में बड़े पैमाने पर बदलाव किए जाएं। उद्योग जगत इसमें लचीलापन चाहता है ताकि कर्मचारियों से उनकी योग्यता के अनुसार काम लेने में उन्हें परेशानी न हो। उनकी मांग यह भी है कि कारोबार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए उन्हें कर्मचारियों की छंटनी का अधिकार भी दिया जाए।
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