05 August, 2008
पब्लिक सेक्टर के अधिकारियों पर, निजी क्षेत्र में जाने पर पाबंदी
कंपनी से इस्तीफा देने या फिर सेवानिवृत्त होने वाले सीईओ सहित कंपनी के कार्यरत निदेशक एक साल के अंदर बिना सरकार की अनुमति के निजी कंपनी में नहीं जा सकते, चाहे वह देशी हो या विदेशी कंपनी। केंद्रीय सतर्कता आयोग के साथ परामर्श के बाद सेवा नियमों में इस बदलाव से 'बागियों' को फिर से सार्वजनिक क्षेत्र में अल्पकालिक और पूर्णकालिक निदेशक के पद आने पर भी रोक लग गई है। हालांकि अधिसूचना में यह भी कहा गया है कि अगर किसी अधिकारी ने पिछले पांच साल तक नए नियोक्ता के साथ आधिकारिक तौर पर काम नहीं किया हो तो उसे ज्वाइनिंग की अनुमति मिल सकती है।
सरकार अनुमति देने से पहले यह भी देखेगी कि निजी क्षेत्र से उनको जो ऑफर दिया जा रहा है वह इंडस्ट्री की मौजूदा स्केल से बहुत अधिक न हो। साथ ही अगर आवेदन के 30 दिनों के अंदर सरकार से अनुमति नहीं मिलती तो वे निजी क्षेत्र में नई नौकरी ज्वाइन कर सकते हैं। सरकार ने यह फैसला वित्त, पेट्रोलियम और अन्य मंत्रालयों के अधिकारियों के निजी क्षेत्र में पलायन के रुख को देखते हुए लिया है। आरोप है कि ये लोग वहां जाकर अपने नए नियोक्ताओं के लिए लॉबिंग करने में जुटे हुए हैं।
05 June, 2008
जैसा काम वैसा वेतन
सिफारिशें क्रियान्वित होती हैं तो 1973 में 9 कंपनियों को दिए गए नवरत्न के दर्जे में बढोतरी होगी और इनकी संख्या 16 हो जाएगी। दूसरा वर्गीकरण मिनी नवरत्न कंपनियों का है जिसमें वर्तमान में 54 कंपनियां है। नवरत्न या मिनी नवरत्न कंपनियों का दर्जा उन कंपनियों को दिया जाता है जिनका प्रदर्शन बेहतर होता है। इस दर्जे को पाने के बाद कंपनियों को वित्तीय और कार्यकारी स्वायत्तता दी जाती है। इसके क्रियान्वित हो जाने पर कर्मचारियों को राजनीतिक स्वतंत्रता तो नहीं मिलेगी लेकिन उनकी जेबें जरूर भर जाएंगी।
कुल आय, श्रम-शक्ति का आकार और भौगोलिक विस्तार ही इस नई श्रेणी के वर्गीकरण का आधार है। इस वर्गीकरण में इन कंपनियों को 0 से 100 अंक निर्धारित किए गए हैं। इंडियन ऑयल और ओएनजीसी जैसी कंपनियां जिनका नाम फॉरच्युन 500 में शुमार है को सर्वाधिक 99 अंक दिए गए हैं। वर्तमान में इन कंपनियों की चार श्रेणियां हैं। इस वर्गीकरण का आधार वर्ष 1997 का प्रस्ताव था। इसके तहत रियायत संरचना और बोर्ड स्तरीय कार्यकारियों को समाहित किया गया था।
इस समीक्षा समिति का मानना है कि वेतन पैनल की रिपोर्ट न्यायसंगत नहीं है क्योंकि इसके अंतर्गत एक ही श्रेणी की कंपनियों के आकार और प्रदर्शन में काफी अंतर है। मिसाल के तौर पर इंडियन ऑयल जिसकी वर्ष 2006-07 में कुल आय 2,18,934 करोड़ रुपये रही को मुंबई रेल विकास कॉरपोरेशन लिमिटेड के साथ रखा गया है जिसकी वार्षिक आय 17 करोड रुपये रही थी। इसके बावजूद वर्तमान तंत्र के अनुसार अगर कोई कंपनी अच्छा प्रदर्शन करती है तो उसे ऊपर की श्रेणी में प्रोन्नति मिल जाती है लेकिन अगर कोई कंपनी खराब प्रदर्शन करती है तो उसका स्थान नही बदलता है।
रिपोर्ट यहाँ देखी जा सकती है।
31 May, 2008
पब्लिक सेक्टर के लिए वेतन संबंधी सिफारिशें सरकार को सौंपी गयीं
जगन्नाथ राव समिति ने शुक्रवार, ३० मई को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Public Sector Units) के अधिकारियों के वेतनमान से संबंधित अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप दीं। इनमें पीएसयू के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक तथा निदेशकों के लिए स्थिर वेतन की सिफारिश की गई है। समिति का गठन नवंबर 2006 में किया गया था।
रिपोर्ट में अलग-अलग वर्ग के उपक्रमों के चेयरमैन एवं एमडी का मूल वेतन 55 हजार रुपये से एक लाख रुपये तथा निदेशकों का मूल वेतन 50 हजार रुपये से 80 हजार रुपये तक रखने का सुझाव दिया गया है। निदेशक मंडल स्तर से नीचे के अधिकारियों का मूल वेतन 11 हजार 500 से 70 हजार रुपये प्रतिमाह के बीच रखने की सिफारिश की गई है। इसमें अधिकारियों को मूल वेतन के 20 प्रतिशत से लेकर दो-दो सौ प्रतिशत तक परिवर्तनशील वेतन देने की सिफारिश भी की गई है। यह कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर निर्भर करेगा।
केंद्रीय लोक उपक्रम एवं भारी उद्योग मंत्री संतोष मोहन देव ने बताया कि पीएसयू के कुल करीब ढाई लाख अधिकारियों के वेतन और भत्तों को प्रभावित करने वाली यह रिपोर्ट मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद लागू की जा सकेगी। उन्होंने उम्मीद जाहिर की दिसंबर से पहले इस पर निर्णय कर लिया जाएगा। समिति ने नए वेतनमान एक जनवरी 2007 से लागू करने की सिफारिश की है।
इस रिपोर्ट में पहली बार उत्पादकता को प्रोत्साहित करने के प्रस्ताव शामिल किए गए हैं। समिति ने पहली बार पीएसयू को पांच श्रेणियों में बांटकर उनके अधिकारियों को 11 हजार रुपये से 25 सौ रुपये तक का जोखिम वेतन और अधिकारियों को कंपनी के शेयर आवंटित करने जैसे विकल्पों की भी सिफारिश की है।
पूरी रिपोर्ट के लिये यहाँ क्लिक करें। अधिक जानकारी यहाँ से ली जा सकती है।
05 December, 2007
जितना ज्यादा मुनाफा, कर्मचारियों को उतना बोनस
श्रम मंत्री ऑस्कर फर्नांडिस ने कहा कि प्रस्ताव में यह बात साफ तौर कर कही गई है कि अगर किसी वजह से कंपनी को घाटा हो गया, तो उसे बोनस बढ़ाने की जरूरत नहीं होगी। मगर ऐसी हालत में भी कर्मचारियों को बोनस जरूर देना होगा। उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियों में अधिकारियों और कर्मचारियों की परफॉर्मेंस देखते हुए बोनस दिया जाता है। मगर ऐसी कंपनियों की संख्या काफी कम है।
कंपनी मामलों के एक्सपर्ट व एडवोकेट प्रदीप मित्तल का कहना है कि बोनस एक्ट के तहत कंपनियों को अपने कर्मचारियों व अधिकारियों को सालाना बेसिक सैलरी का कम से कम 8.33 फीसदी देना होता है। एक्सग्रेशिया यानी अनुग्रह राशि के रूप में कंपनियां अतिरिक्त रूप से इसमें जितना मर्जी जोड़ सकती हैं। ज्यादातर कंपनियां अपने अधिकारियों को मोटी राशि बोनस के रूप दे रही हैं, मगर कर्मचारियों को नियत राशि बोनस के रूप में दी जा रही है।
सीपीआई के सेक्रेटरी डी. राजा इस प्रस्ताव से इत्तिफाक रखते हैं। उनका कहना है कि अगर केंद्र सरकार इस तरह का कोई प्रस्ताव लाती है, तो उसका स्वागत किया जाएगा। जो कर्मचारी कंपनियों की तरक्की में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं, उनको मुनाफे में कुछ तो मिलना चाहिए।
16 November, 2007
रिटायर होने की उम्र बढ़ाने की तैयारी में सरकार!
हाल के दिनों में विभिन्न मुद्दों पर यूपीए-लेफ्ट रिश्तों में खटास आती रही है। इनमें भारत-अमेरिका परमाणु करार का मसला भी शामिल रहा है। रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने के तरीके को लागू करने पर अभी कार्मिक और वित्त मंत्रालय में काम चल रहा है। इसकी औपचारिक घोषणा बजट में किए जाने की संभावना है। नवभारत टाइम्स में छ्पी खबर के अनुसार अगर इसे लागू किया गया, तो इसका फायदा सभी सरकारी कर्मचारियों को मिलेगा। रेलवे और पोस्टल जैसे डिपार्टमेंट के कर्मचारियों के अलावा पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों को भी इसका फायदा मिल सकता है।