05 June, 2008
शैक्षिक विशेषज्ञों का रिटायरमेंट 65 में
प्रशासनिक पदों पर मौजूद केंद्रीय स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकारियों के पास शैक्षिक पदों पर नियुक्ति पाने का विकल्प होगा, बशर्ते वे 65 साल तक सेवा करना चाहते हैं।
02 April, 2008
इलाज पर ज्यादा खर्च किया तो भुगतान नहीं
सरकारी कर्मचारी अपनी मर्जी के अस्पतालों में इलाज करवाने से पहले सोच लें। उन्हें इलाज खर्च का उतना ही भुगतान होगा जितना उनके विभाग ने नियमानुसार तय किया है। नियम से ज्यादा का भुगतान किसी भी स्थिति में नहीं किया जा सकता। यह व्यवस्था देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो सरकारी कर्मियों को दिए जाने वाले तय मेडिकल खर्च से ज्यादा भुगतान देने के हाईकोर्ट के फैसलों को रद कर दिया। जस्टिस एस।बी। सिन्हा और वी।एस। सिरपुरकर की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद-३०९ के तहत राज्य सरकारों को अपने कर्मचारियों के चिकित्सा खर्च को तय करने और उनके नियम बनाने का अधिकार है। इन नियमों में उदारता बरतने का कोई प्रावधान नहीं किया गया है लेकिन मामला अत्यंत गंभीर बीमारियों का है इसलिए अनुच्छेद-142 के तहत असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सर्वोच्च अदालत आदेश देती है कि इन दो मामलों में कर्मचारियों को अतिरिक्त भुगतान दे दिया जाए। लेकिन स्पष्ट किया जाता है कि यह आदेश नजीर के रूप में न लिया जाए।मामले के अनुसार कर्नाटक के टैक्स विभाग और राजस्थान के न्यायिक विभाग के दो कर्मचारियों ने क्रमश्र: दिल और गुर्दे की बीमारी का इलाज निजी अस्पतालों में करवाया। दिल के मरीज के बाइपास सर्जरी पर खर्च 150,600 रुपये आया। लेकिन रिइंबर्समेंट पर सरकार ने उसे 39,207 रुपये ही दिए। इसी प्रकार दिल्ली के बत्रा अस्पताल में गुर्दा बदलवाने का खर्च आया 2.11 लाख रुपये लेकिन राज्य सरकार ने भुगतान किया सिर्फ 50,000 रुपये। गुर्दे के मरीज को एम्स में रेफर किया गया था लेकिन बिस्तर उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्होंने इमरजेंसी में बत्रा अस्पताल में इलाज करवाया। कम भुगतान मिलने के खिलाफ दोनों कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में रिट दायर की। कर्नाटक और दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार कर लीं और सरकारों को आदेश दिया कि कर्मचारियों को इलाज पर आए वास्तविक खर्च का भुगतान किया जाए। इस आदेश का राज्य सरकारों ने चुनौती दी थी।
30 March, 2008
डॉक्टर और वेतन आयोग
चर्चा गरम है कि डाक्टर प्राइवेट नौकरी की तरफ भाग सकते हैं। छठवें वेतन आयोग की सिफारिश में यह 'मामूली' वेतन वृद्धि सरकारी डाक्टरों को बांध नहीं सकेगी। अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा अस्पतालों और मरीजों की बेतहाशा भीड़ का। एक भुक्तभोगी हैं, जिन्हें किडनी का आपरेशन कराने की तारीख छह महीने से नहीं मिल रही। डॉक्टरों की कमी की वजह से एक सर्जन को इतने अधिक आपरेशन करने होते हैं कि वह चाहते हुए भी जल्दी तारीख नहीं दे सकता। बड़े अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों की संख्या आवश्यकता से 25-30 प्रतिशत कम है। कहां हैं डाक्टर? नवीन गौतम लिखते हैं कि अस्पताल प्रशासकों के मुताबिक मोटी तनख्वाह के बदले कुछ बड़े निजी अस्पताल चले गए, कुछ विदेश निकल गए और कुछ ने अपने नर्सिग होम खोल लिए। सऊदी अरब में एक भारतीय डाक्टर को कम से कम एक लाख रुपये महीना करमुक्त वेतन मिलता है। सरकारी संस्थानों में बीस-बीस साल नौकरी कर चुके पुराने डाक्टर जब नए खून को पैसे में लोटते देखते हैं, तो वे भी बाहर जाने की जुगत लगाते हैं। डाक्टरों के विदेश जाने की प्रवृत्ति का एक अच्छा उदाहरण एम्स है, जहां कुल 42 बैच से निकले 2129 छात्रों में 780 को विदेश बेहतर लगा। जब सरकार बाजार का मुकाबला नहीं कर सकती हैं, तो फिर वेतन की तुलना क्यों की जाती है?